New Delhi
भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच दो दशक लंबी फ्री ट्रेड वार्ता अब निर्णायक चरण में प्रवेश कर चुकी है। इस ऐतिहासिक मोड़ पर, भारत के गणतंत्र दिवस समारोह में यूरोपीय काउंसिल के अध्यक्ष एंतोनियो लुईस सांतोस दा कोस्टा और यूरोपीय कमीशन की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए।
विशेषज्ञ इसे केवल सामान्य व्यापार समझौता नहीं, बल्कि अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत पर लगाए गए 50 प्रतिशत टैरिफ़ दबाव का जवाब मान रहे हैं। इस डील के जरिए भारत अमेरिका के टैरिफ़ से राहत पाने के साथ-साथ यूरोपीय संघ को चीन पर अपनी व्यापारिक निर्भरता कम करने का अवसर मिलेगा।
बीबीसी में छपी रिपोर्ट के मुताबिक़, इस डील को दोनों पक्षों ने “मदर ऑफ ऑल डील्स” बताया। भारत के वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने इसे ऐतिहासिक करार दिया। यह डील भारत का नौवां एफटीए होगा और ब्रसेल्स के लिए मर्कोसुर (दक्षिण अमेरिकी ट्रेड ब्लॉक) के बाद अगला बड़ा कदम माना जा रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि भारत की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था और 4 ट्रिलियन डॉलर की जीडीपी पार करने की संभावना इस डील को और भी महत्वपूर्ण बनाती है। इकोनॉमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट की सुमेधा दासगुप्ता के अनुसार, दोनों पक्ष अब भरोसेमंद और स्थिर व्यापारिक साझेदार चाहते हैं, क्योंकि वैश्विक भू-राजनीति ने व्यापारिक माहौल को अस्थिर कर दिया है।
कूटनीतिक और आर्थिक संकेत साफ़ कर रहे हैं कि 27 जनवरी को उच्चस्तरीय शिखर सम्मेलन में समझौते का ऐलान संभव है। इस कदम के बाद भारत-ईयू संबंधों में नई दिशा आएगी और वैश्विक व्यापार में भारत की भूमिका को और मजबूत किया जाएगा।
इस समझौते से भारत की संरक्षणवादी नीति में बदलाव का संकेत मिलता है और यूरोपीय संघ के लिए भी यह आर्थिक और भू-राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण साझेदारी साबित होगी।
