परंपरागत आदिवासी चिकित्सक बनेंगे सरकारी डॉक्टर, जनजातीय इलाकों में स्वास्थ्य को मिलेगी नई ताकत

जनजातीय इलाकों में स्वास्थ्य पहुंच बढ़ाने की दिशा में केंद्र सरकार का बड़ा कदम

CENTRAL DESK

केंद्र सरकार ने समावेशी स्वास्थ्य सेवा की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए देशभर में पहली बार एक राष्ट्रीय पहल की शुरुआत की है, जिसके तहत आदिवासी पारंपरिक चिकित्सकों को औपचारिक रूप से सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली से जोड़ा जाएगा। जनजातीय कार्य मंत्रालय की इस पहल का शुभारंभ हैदराबाद के कन्हा शांति वनम में किया गया।

इस राष्ट्रीय क्षमता निर्माण कार्यक्रम का उद्देश्य आदिवासी इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच को मजबूत करना है, जहां पारंपरिक हकीमों पर समुदाय का गहरा भरोसा रहा है। सरकार का मानना है कि इन हकीमों की स्थानीय समझ, अनुभव और स्वीकार्यता का लाभ उठाकर अंतिम छोर तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाई जा सकती हैं। यह पहल ‘विकसित भारत’ के विजन के तहत सामुदायिक भागीदारी और सांस्कृतिक रूप से संवेदनशील समाधान पर आधारित है।

कार्यक्रम के उद्घाटन सत्र में केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्री जुएल ओराम, राज्य मंत्री दुर्गादास उइके, तेलंगाना के जनजातीय कल्याण मंत्री अदलुरी लक्ष्मण कुमार, सांसद बलराम नाइक समेत केंद्र और राज्यों के वरिष्ठ अधिकारी, स्वास्थ्य संस्थानों के प्रतिनिधि और देशभर से आए करीब 400 आदिवासी हकीम शामिल हुए।

जनजातीय कार्य मंत्रालय के अधिकारियों ने कहा कि पारंपरिक हकीम न केवल रोगों की शुरुआती पहचान और रोकथाम में मदद कर सकते हैं, बल्कि जरूरत पड़ने पर मरीजों को औपचारिक चिकित्सा व्यवस्था से जोड़ने में भी अहम भूमिका निभा सकते हैं। मंत्रालय ने माना कि सांस्कृतिक और भौगोलिक दूरी को पाटे बिना आदिवासी इलाकों में स्वास्थ्य परिणामों में सुधार संभव नहीं है।

मंत्रालय की सचिव ने बताया कि कई आदिवासी जिलों में आज भी मलेरिया, टीबी और कुष्ठ जैसी संक्रामक बीमारियों का बोझ बना हुआ है। ऐसे में सामुदायिक मॉडल पर आधारित इस पहल से रोग उन्मूलन के प्रयासों को गति मिलेगी। उन्होंने कहा कि सरकार देशभर में करीब एक लाख आदिवासी हकीमों को पहचान और समर्थन देने की योजना पर काम कर रही है।

तेलंगाना के जनजातीय कल्याण मंत्री ने राज्य की आदिवासी विविधता की ओर ध्यान दिलाते हुए कहा कि 30 से अधिक मान्यता प्राप्त जनजातियों की अपनी अलग सांस्कृतिक और औषधीय परंपराएं हैं। उन्होंने जनजातीय इलाकों में प्राथमिक और द्वितीयक स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत करने की जरूरत पर जोर दिया।

राज्य मंत्री दुर्गादास उइके ने कहा कि आदिवासी समाज ने प्रकृति आधारित जीवनशैली और चिकित्सा पद्धतियों को पीढ़ियों से सहेज कर रखा है, जिससे आधुनिक स्वास्थ्य प्रणाली को भी सीख मिल सकती है। उन्होंने पारंपरिक ज्ञान, वैज्ञानिक शोध और तकनीक के संतुलित उपयोग की बात कही।

कार्यक्रम के दौरान जनजातीय कार्य मंत्रालय और आईसीएमआर के क्षेत्रीय चिकित्सा अनुसंधान केंद्र, भुवनेश्वर के बीच एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए। इसके तहत ‘भारत ट्राइबल हेल्थ ऑब्जर्वेटरी’ की स्थापना की जाएगी, जो आदिवासी समुदायों से जुड़ा स्वास्थ्य डेटा तैयार कर नीति निर्माण और योजनाओं के क्रियान्वयन में मदद करेगा।

विशेषज्ञ सत्रों में आईसीएमआर, एम्स, डब्ल्यूएचओ और आयुष मंत्रालय के प्रतिनिधियों ने आदिवासी स्वास्थ्य, वैश्विक अनुभवों और सिकल सेल जैसी बीमारियों पर चर्चा की। वक्ताओं ने कहा कि स्पष्ट भूमिका, प्रशिक्षण और रेफरल व्यवस्था से आदिवासी हकीम प्राथमिक स्वास्थ्य व्यवस्था के मजबूत स्तंभ बन सकते हैं।

यह पहल आदिवासी स्वास्थ्य शासन में एक नए मॉडल की शुरुआत मानी जा रही है, जहां पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक चिकित्सा मिलकर जनजातीय समुदायों के स्वास्थ्य और सम्मान दोनों को मजबूत करेंगे।

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