- TANVIR AHMAD
8 जनवरी 1858 को चुटुपालु घाटी में फांसी पर चढ़कर शहीद होने वाले शेख भिखारी की पुण्यतिथि हर साल आती है, लेकिन झारखंड में इसकी अपेक्षा उतनी नहीं होती जितनी होनी चाहिए। एक ऐसे स्वतंत्रता सेनानी, जो 1857 के महान विद्रोह में ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ खड़े हुए, रांची को ब्रिटिश कब्जे से बचाने में अहम भूमिका निभाई, और शहीद टिकैत उमराव सिंह के दीवान व कमांडर के रूप में युद्ध लड़े, फिर भी उनकी क़ुर्बानियों और पहचान को वह सम्मान नहीं मिला जो अन्य महापुरुषों को मिला है। यह अनदेखी न केवल ऐतिहासिक अन्याय है, बल्कि आज के सांप्रदायिक माहौल में एक खोई हुई अवसर की तरह लगती है, जहां हिंदू-मुस्लिम के बीच नफरत की दीवारें और ऊंची की जा रही हैं।
शेख भिखारी का जन्म 1819 में रांची जिले के खुदिया गांव में एक मुस्लिम परिवार में हुआ था।1857 के विद्रोह के दौरान, जब वे 38 वर्ष के थे, उन्होंने टिकैत उमराव सिंह के साथ मिलकर ब्रिटिश सेना का मुकाबला किया। वे चतरा में जय मंगल पांडे के साथ भी लड़े और हजारीबाग जेल से कैदियों को छुड़ाने की कोशिश की।ब्रिटिश जनरल मैकडोनाल्ड ने उन्हें और टिकैत उमराव सिंह को गिरफ्तार कर फांसी दी। लोककथाओं में उनकी बहादुरी की कहानियां हैं, लेकिन मुख्यधारा के इतिहास में वे “अनसंग हीरो” बने रह गए। झारखंड में उनके नाम पर कुछ संस्थान हैं, जैसे शहीद शेख भिखारी कॉलेज ऑफ एजुकेशन, रांची और शेख भिखारी मेडिकल कॉलेज, हजारीबाग, लेकिन ये पर्याप्त नहीं हैं। क्या कोई बड़ा एयरपोर्ट, विश्वविद्यालय या स्टेडियम उनके नाम पर है? नहीं।
जब हम झारखंड के अन्य स्वतंत्रता सेनानियों से तुलना करें तो शेख भिखारी को मिला सम्मान अपेक्षित रूप से कम लगता है।
शेख भिखारी की ऐसी अनदेखी क्यों? यह सवाल उठता है कि राज्य सरकारों ने उनकी स्मृति/ याद/योगदान को मुख्यधारा में क्यों नहीं लाया। उनके वंशज आज भी पेंशन और नौकरियों की मांग कर रहे हैं, लेकिन सरकारी उदासीनता बनी हुई है। राहुल गांधी ने 2024 में भारत जोड़ो न्याय यात्रा के दौरान उनकी शहादत स्थल पर श्रद्धांजलि दी, लेकिन वह भी एक बार की घटना थी।
यह अनदेखी और भी दुखद लगती है आज के सांप्रदायिक माहौल में, जहां हिंदू-मुस्लिम के बीच नफरत की दीवारें खड़ी की जा रही हैं। सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक भाषणों तक, विभाजन की राजनीति हावी है। लेकिन शेख भिखारी (मुस्लिम) और टिकैत उमराव सिंह (हिंदू) ने 1857 में साथ लड़कर सांप्रदायिक सद्भाव का एक अनोखा उदाहरण दिया। वे एक-दूसरे के दीवान और साथी योद्धा थे, जिन्होंने धर्म की दीवारों को पार कर देश के लिए बलिदान दिया।
CPIML जैसे संगठन और उनके वंशज उनकी शहादत दिवस मनाते हैं, लेकिन सरकारी स्तर पर यह क्यों नहीं? झारखंड सरकार को चाहिए कि समाज में बढ़ती सांप्रदायिकता को कम करने के लिए उनके नाम से “सद्भावना और वीरता अवार्ड” शुरू करे। यह अवार्ड उन व्यक्तियों या संगठनों को दिया जाए जो सद्भाव को बढ़ावा देते हैं या बहादुरी दिखाते हैं। इससे न केवल शेख भिखारी को सच्चा सम्मान मिलेगा, बल्कि युवा पीढ़ी को सद्भाव का संदेश भी जाएगा। झारखण्ड सरकार को चाहिए की शहीद शेक भिकारी के नाम से सरकारी योजनाओं की शुरुआत करनी चाहिए ताकी आने वाले नशालों को उनकी क़ुरबानी याद रहे।
झारखंड, जो आदिवासी और बहुलतावादी संस्कृति का प्रतीक है, को अपने इतिहास के सभी पहलुओं को अपनाना चाहिए। शेख भिखारी की अनदेखी जारी रही तो हम न केवल एक महान सेनानी को भूलेंगे, बल्कि सद्भाव की उस विरासत को भी, जो आज सबसे ज्यादा जरूरी है।

(तनवीर अहमद, सामाजिक कार्यकर्त्ता हैं और रांची में रहते हैं। समसामियक विषयों पर निरंतर लिखते रहते हैं)
