रांची से जबलपुर तक जनजातीय भाषाओं का संवाद, TRL संकाय बना राष्ट्रीय मॉडल; अकादमिक सहयोग की नई पहल

RANCHI

जनजातीय भाषाओं, संस्कृति और सहअस्तित्व को अकादमिक मंच पर मजबूती देने की दिशा में रांची विश्वविद्यालय के जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा (टीआरएल) संकाय में सोमवार, 05 जनवरी को एक महत्वपूर्ण शैक्षणिक संवाद देखने को मिला। रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय, जबलपुर (मध्य प्रदेश) के प्रोफेसर (डॉ) विशाल बन्ने ने टीआरएल संकाय का औपचारिक दौरा किया।

डीन प्रो. अर्चना कुमारी दुबे के नेतृत्व में आयोजित इस संवाद के दौरान प्रो. बन्ने ने संकाय में संचालित नौ जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषाओं से जुड़ी शैक्षणिक, सांस्कृतिक और शोध गतिविधियों का गहन अवलोकन किया। उन्होंने पाठ्यक्रम की संरचना, लोक जीवन से जुड़े अकादमिक प्रयोग और सांस्कृतिक संरक्षण के प्रयासों को सराहा।

टीआरएल संकाय की शैक्षणिक परंपरा से प्रभावित प्रो. बन्ने ने कहा कि रांची का टीआरएल संकाय जनजातीय भाषाओं के संरक्षण और अकादमिक समावेशन का राष्ट्रीय मॉडल है। उन्होंने अपने विश्वविद्यालय में भी जनजातीय भाषाओं की पढ़ाई शुरू करने की पहल करने की बात कही।

गौरतलब है कि प्रो. बन्ने मोरहाबादी फुटबॉल ग्राउंड में आयोजित AIU ईस्ट ज़ोन फुटबॉल टूर्नामेंट में पर्यवेक्षक के रूप में झारखंड आए हुए हैं। इसी क्रम में उन्होंने टीआरएल संकाय का दौरा कर आदिवासी-मूलवासी सहअस्तित्व, लोक संस्कृति और भाषाई विविधता पर आधारित शैक्षणिक ढांचे को नजदीक से समझा।

इस अवसर पर टीआरएल संकाय के प्राध्यापक डॉ. कुमारी शशि, डॉ. दमयंती सिंकु, डॉ. बीरेन्द्र कुमार सोय, डॉ. दिनेश कुमार, डॉ. बीरेन्द्र कुमार महतो, डॉ. रीझु नायक, डॉ. तारकेश्वर सिंह मुंडा, डॉ. किशोर सुरिन, डॉ. सरस्वती गागराई, डॉ. अर्चना कुमारी, डॉ. बन्दे खलखो, करम सिंह मुंडा, राजकुमार बास्के, प्रेम मुर्मू, डॉ. अनुराधा मुंडू एवं शकुंतला बेसरा सहित अन्य शिक्षकों ने संकाय की गतिविधियों की विस्तृत जानकारी साझा की।

यह दौरा केवल औपचारिक मुलाकात नहीं, बल्कि झारखंड से मध्यप्रदेश तक जनजातीय भाषाओं और संस्कृति के अकादमिक सेतु निर्माण की दिशा में एक नई शुरुआत के रूप में देखा जा रहा है।

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