न्यूज डेस्क
भारतीय रुपया अमेरिकी टैरिफ के दबाव से उबर नहीं पा रहा है। रूस से तेल आयात पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा भारत पर अतिरिक्त 25% टैरिफ थोपने के बाद कुल दरें 50% तक जा पहुंची हैं। यही वजह है कि डॉलर के मुकाबले रुपये में ऐतिहासिक गिरावट दर्ज की जा रही है और विदेशी निवेशकों का भरोसा लगातार कमजोर हो रहा है।
सोमवार को हफ्ते के पहले कारोबारी दिन रुपया 17 पैसे फिसलकर 88.26 पर बंद हुआ। यह गिरावट पिछले हफ्ते शुक्रवार को 88.09 पर बंद हुए स्तर से भी नीचे है। यानी रुपया अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच चुका है।
दिलचस्प यह रहा कि रुपये की इस गिरावट के बावजूद शेयर बाजार ने मजबूती दिखाई। सेंसेक्स 343 अंक उछलकर 80,153 के पार चला गया, जबकि निफ्टी भी 105 अंकों की छलांग लगाकर 24,532 पर पहुंचा। वहीं, ब्रेंट क्रूड 0.41% बढ़कर 67.20 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार करता दिखा।
विदेशी पूंजी की भारी निकासी ने रुपये की मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। आंकड़ों के मुताबिक, सिर्फ शुक्रवार को विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) ने 8,300 करोड़ रुपये से ज्यादा के शेयर बेच डाले। डॉलर इंडेक्स में मामूली कमजोरी के बावजूद रुपये को कोई सहारा नहीं मिला।
क्यों फंसा रुपया?
रुपये की गिरावट की जड़ अमेरिकी टैरिफ है। ट्रंप प्रशासन की यह सख्ती रूस पर दबाव बनाने की रणनीति का हिस्सा है, लेकिन इसका खामियाजा भारत जैसे देशों को भुगतना पड़ रहा है।
भारत अब इस झटके को झेलने के लिए दो मोर्चों पर सक्रिय है—एक ओर जीएसटी सुधारों के जरिए घरेलू अर्थव्यवस्था को सहारा देने की कोशिश, और दूसरी ओर रूस व चीन जैसे साझेदार देशों के साथ व्यापारिक रिश्ते मजबूत कर वैकल्पिक रास्ते तलाशना।
