रांची में याद किये गये स्टेन स्वामी, वक्ताओं ने उनके संघर्ष और सामाजिक न्याय की विरासत को बताया

 

RANCHI

सामाजिक कार्यकर्ता और आदिवासी अधिकारों के पक्षधर फादर स्टान स्वामी को याद करते हुए रविवार को ‘बगइचा’ परिसर में श्रद्धांजलि कार्यक्रम आयोजित किया गया। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में सामाजिक कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों और नागरिकों ने हिस्सा लिया तथा उनके जीवन, संघर्ष और विचारों को स्मरण किया।

कार्यक्रम की शुरुआत बगइचा परिसर में स्थापित स्टान स्वामी की प्रतिमा पर पुष्पांजलि अर्पित कर की गई। इसके बाद सभागार में आयोजित विचार गोष्ठी में विभिन्न वक्ताओं ने उनके व्यक्तित्व, सामाजिक योगदान और न्याय के लिए किए गए संघर्षों पर विस्तार से अपने विचार रखे।

सामाजिक न्याय और मानवाधिकारों के संघर्ष को किया याद

वक्ताओं ने कहा कि स्टान स्वामी ने अपना पूरा जीवन आदिवासियों, वंचितों और कमजोर तबकों के अधिकारों के लिए समर्पित कर दिया। उन्होंने समाज के हाशिए पर खड़े लोगों की आवाज को राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने का काम किया और न्याय के लिए लगातार संघर्ष किया।

इस दौरान कई वक्ताओं ने देश की वर्तमान सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों पर भी चिंता व्यक्त की तथा लोकतांत्रिक मूल्यों और नागरिक अधिकारों की रक्षा की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि स्टान स्वामी के विचार और संघर्ष आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बने रहेंगे।

इन्कलाबी गीतों और डॉक्यूमेंट्री के जरिए दी श्रद्धांजलि

कार्यक्रम के दौरान प्रवीण पीटर और नंदिता ने प्रसिद्ध शायर हबीब जालिब का चर्चित इन्कलाबी गीत ऐसे दस्तूर को, सुबह-ए-बे-नूर को; मैं नहीं मानता, मैं नहीं जानता…” प्रस्तुत किया, जिसे उपस्थित लोगों ने भी स्वर दिया।

इसके बाद स्टान स्वामी के जीवन और सामाजिक कार्यों पर आधारित एक डॉक्यूमेंट्री का प्रदर्शन किया गया। फिल्म के माध्यम से उनके संघर्ष, आदिवासी समाज के प्रति समर्पण और सामाजिक न्याय के लिए किए गए प्रयासों को दर्शाया गया।

विचारों को आगे बढ़ाने का लिया संकल्प

कार्यक्रम में मौजूद लोगों ने स्टान स्वामी के विचारों और मूल्यों को आगे बढ़ाने का संकल्प लिया। वक्ताओं ने कहा कि समाज के कमजोर वर्गों के अधिकारों की रक्षा और लोकतांत्रिक मूल्यों को मजबूत करने के लिए उनके संघर्ष को निरंतर आगे ले जाना ही उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

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